अखिल भारतीय ओमर-ऊमर वैष्य महासभा (पंजी.)

संस्थापित 1928
उद्देश्य एवं नियम -

1. नामः- समस्त ओमर (ऊमर) वैश्य भाइयों की इस संस्था का नाम ‘अखिल भारतीय’ ओमर-ऊमर वैश्य महासभा’ होगा।

2. कार्य क्षेत्र :- इस संस्था का कार्य क्षेत्र समस्त भारत होगा।

3. कार्यालय -
अ) प्रधान कार्यालय - संस्था का प्रधाना कार्यालय स्थायी रूप से कानपुर में रहेगा।
ब) प्रबन्ध कार्यालय - संस्था के महामंत्री के साथ संलग्न रहेगा।
स) क्षेत्रीय कार्यालय - समयानुकूल एवं आवश्यकतानुसार स्थापित किये जा सकेंगे।

4. उद्देश्य :-
क) ओमर-ऊमर वैष्य समाज के साथ हीउ अन्याय वैश्य वर्गों (दृढ़ोमर, दोसर वैश्य आदि) के बीच निकटता उत्पन्न तथा उनका सामाजिक एकीकरण करना।
ख) वैश्य समाज की समयानुकूल उन्नति करना।
ग) स्वजाति बन्धुओं मे आत्मबल एवं आत्मनिर्भरता जागृत कर उन्हें देशभक्त, सच्चरित्र नागरिक बनाकर उनमें सहयोग, सद्भावना एवं सेवा की भावना उत्पन्न करना।
घ) समस्त ओमर-ऊर वैश्य समाज की आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिकए उन्नति करना।
ड़) सामाजिक कुप्रथाओं का उन्मूलन करना।
च) समाजोपयोगी साहित्य का सृजन करना तथा पत्रिका का प्रकाशन करना।
छ) स्वजातिय बन्धु जहां रहते हों वहां आवश्यकतानुसार संगठन की इकाइयाँ स्थापित करना तथा अन्य स्वजातीय संगठनों को उनकी स्वेच्छानुसार सम्बद्धता प्रदान कर उनसे सहयोग का आदान-प्रदान करना।
ज) संस्था के उद्वेश्यों की पूर्ति हेतु चल एवं अचल सम्पत्ति का अधिग्रहण, निर्माण, प्रबन्ध, क्रय, विक्रय, उपार्जन, विसर्जन, तथा किराये पर लेने-देने आदि की व्यवस्था करना।
झ) अन्य सभी ऐसे कार्य करना जो उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु आवश्यक, उपयोगी एवं प्रासंगिक हों।

नियम
5. सदस्यता -

क) साधारण सदस्य - रू0 10/- एक सत्र हेतु सदस्यता शुल्क।
ख) आजीवन सदस्य - कम से कम रू0 101/- प्रदान करने पर।
ग) संरक्षक सदस्य - कम से कम रू0 1001/- प्रदान करने पर।

6. योग्यता-
क) 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक व्यक्ति महासभा का सदस्य बन सकता है।
ख) अन्य वैश्य समाज के व्यक्ति भी सदस्य बन सकते हैं।

7. प्रतिबन्ध -
वह व्यक्ति महासभा का सदस्य नहीं रहेगा -
क) जिसका त्यागपत्र स्वीकृत हो जाएं
ख) महासभा द्वारा सामाजिक हित में निकाला या हटाया गया हो।
ग) नैतिक अपराध में दण्डित हो चुका हो।

8. सदस्यों के अधिकार
क) 18 वर्ष के या उससे अधिक वाले व्यक्ति की एक सत्र का रू0 10/- शुल्क देने पर सदस्यता स्वीकार होगी।
ख) केवल सदस्यों को ही मतदान का अधिकार होगा।
ग) खुले अधिवेशन की समस्त कार्यवाही में एवं निर्वाचन में भाग लेने का अधिकार होगा।
घ) अधिवेशन में कम से कम एक सप्ताह पूर्व अपना प्रस्तव भेजने का अधिकार होगा।
ड़) अध्यक्ष महोदय की स्वीकृति से अन्य आवश्यक प्रस्ताव तत्काल अधिवेशन में विचारार्थ प्रस्तुत करने का अधिकार होगा।
च) खुले अधिवेशन में महासभा के पदाधिकारियों के निर्वाचन में मतदान का अधिकार केवल सदस्यों को ही होगा किन्तु शेष विषयों पर समस्त उपस्थित बन्धु अपना मतामत प्रकट कर सकेंगे।

कर्तव्य
महासभा के घोषित उद्देश्यों एवं पारित प्रस्तावों को निष्ठापूर्वक कार्यान्वित करने में सहयोग प्रदान करना प्रत्येक सदस्य का आवश्यक कर्तव्य होगा।

9. घटक -
क) क्षेत्रीय समिति
ख) केन्द्रीय समिति

10. क्षेत्रीय समिति का गठन :
क) समाज के कम से कम 25 व्यक्तियों को सदस्य बनाकर क्षेत्रीय समिति स्थापित की जा सकेगी।
ख) जिन क्षेत्रीय समितियों की सदस्य संख्या 100 से कम होगी, उसको संचालित करने हेतु 11 सदस्यीय संचालन समिति होगी, जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री, संगठन मंत्री, कोषाध्यक्ष तथा 6 सदस्य होंगे। इनका निर्वाचन प्रति 3 वर्ष के सत्र में क्षेत्रीय समिति के सदस्य स्वयं करेंगे।
ग) जिन क्षेत्रीय समितियों की सदस्य संख्या 100 या इससे अधिक होगी उसके संचालन हेतु प्रति 3 वर्ष में उस क्षेत्रीय समिति के सदस्यों द्वारा 15 व्यक्तियों की संचालन समिति निर्वाचित करके गठित की जायेगी। जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री संयक्त मंत्री, संगठन मंत्री, कोषाध्यक्ष, निरीक्षक एवं 7 सदस्य होंगे।

11. क्षेत्रीय समिति के कर्तव्य -

क) महासभा के उद्देश्यों एवं नियमों के अन्तर्गत अपने क्षेत्र में कार्य का विस्तार करना। एतदर्थ स्वयमेव धन की व्यवस्था करना।
ख) महासभा के उद्देश्यों का प्रचार व प्रसार करना। महासभा द्वारा पारित प्रस्तावों को क्रियान्वित करने में सक्रिय सहयोग प्रदान करना।
ग) स्थानीय उपयोगिता की दृष्टि से समाजोपयोगी कार्यक्रमों का आयोजन करना।
घ) प्रान्तीय स्तर के आवश्यक समाजोपयोगी कार्यक्रमों का आयोजन करना।
ड़) महासभा की केन्द्रीय कार्यसमिति द्वारा निर्धारित आर्थिक विनियोजन में सक्रिय सहयोग प्रदान करना।
च) अपनी क्षेत्रीय समिति का आय विवरण उचित रूप से रखना तथा उसे निर्वाचन के समय सदस्यों के बीच पारित करवाना। महासभा के मांगने पर केन्द्रीय कार्यसमिति को प्रेषित करना।
छ) जिन क्षेत्रीय समितियों की संख्या 100 से कम है वे रू0 250/- तथा जिनकी संख्या 100 या उससे अधिक है वे रू0 500/- प्रति सत्र प्रत्येक अधिवेशन तिथि के 3 माह पूर्व प्रेषित कर अपनी नवीन मान्यता प्राप्त करेंगी। पूर्व मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय समितियाँ भी इसी भांति उपरोक्त शुल्क प्राप्त नहीं होता है तो उनकी मान्यता नवीकृत करायेंगी। यदि समय पर उपरोक्त शुल्क प्राप्त नहीं होता है तो उनकी मान्यता वैध न होगी तथा वे क्षेत्रीय समितियाँ अधिकारविहीन हो जायेंगी। मान्यता प्राप्त करने/नवीकरण के समय सदस्य सूची सदस्यों के नाम व पते सहित भेजना अनिवार्य होगा।

12. क्षेत्रीय समिति के अधिकार -
क) महासभा अधिवेशन हेतु प्रस्ताव भेजने तथा उस ापर मतामत प्रकट करने का अधिकार।
ख) महासभा अधिवेशन में इच्छित संख्या में प्रतिनिधि भेजने का अधिकार होगा और वे प्रतिनिधि अधिवेशन में पंजीकरण प्राप्त करके अधिवेशन के समस्त कार्यक्रमों तथा निर्वाचन में भाग लेने के अधिकारी होंगे।
ग) क्षेत्रीय समितियाँ अपने कार्य संचालन हेतु सदस्यों से प्रतिवर्ष अधिकतम सदस्यता शुल्क रू0 10/- प्राप्त कर सकेंगी।
घ) क्षेत्र के हित की दृष्टि से समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करना तथा उस हेतु महासभा द्वारा आर्थिक अनुदान एवं सहयोग प्राप्त करने का अधिकार होगा।
ड़) महासभा एवं अन्य संगठनों द्वारा संचालित समाज को लाभ देने वाली योजनाओं का लाभ प्रदान करवाने हेतु जरूरतमंद व्यक्तियों की अनुशंसा करना।

धारा 13, 14, तथा 15 संविधान संशोधन के कारण विलुप्त हो गई है।

16. अन्य स्वजातीय सामाजिक संस्थायें -
समाज को वे संस्थायें जो विभिन्न नामांं से विभिन्न स्थानों में कार्यरत हैं। यदि महासभा द्वारा किसी प्रकार का सहयोग प्राप्त करना चाहें तो उनको महासभा द्वारा सम्बद्धता प्राप्त करने पर प्रत्येक संभव सहयोग सहर्ष प्रदान किया जायेगा।
क) संबद्धता प्राप्ति हेतु रू0 21/- की राशि वार्षिक देय होगी।
ख) संबद्धता प्राप्ति के बाद लिये महासभा कार्य समिति की स्वीकृति अनिवार्य है।
ग) संबद्धता प्राप्ति के बाद जिन इकाइयों की न्यूनतम सदस्य संख्या 100 होगी, उन्हें धारा 11 की उपधारा ‘छ’ के अनुसार शुल्क प्रदान करने पर वे सभी अधिकार प्राप्त हो जायेंगे जो महासभा की क्षेत्रीय समिति को प्राप्त है।

17. अध्यक्ष का निर्वाचन -
नामांकन -
अध्यक्ष पद हेतु नामांकन प्रस्तुत करने का अधिकार महासभा के प्रत्येक सदस्य को होगा किन्तु वह नाम क्षेत्रीय समिति के माध्यम से अनुमोदित होकर आना अनिवार्य है। किन्तु क्षेत्रीय समिति भी नाम प्रस्तावित कर सकती है। केन्द्रीय कार्यसमिति के सदस्य सीधे नाम प्रस्तावित कर सकेंगे।

प्रक्रिया -
क्षेत्रीय समिति समस्त आये नामों में से घोषित तिथि के अन्तर्गत केवल एक ही नाम अपनी संस्कृति के साथ प्रस्तुत कर सकती है है इस प्रकार आये हुए समस्त नामांकन पत्रों पर अखिल भारतीय ओमर-ऊमर वैश्य महासभा की कार्यसमिति सर्वसम्मत अथवा बहुमत से किसी एक नाम को निर्णीत करेगी जो अन्तिम होगा और अगले कार्यकाल में महासभा क अध्यक्ष पद को सुशोभित करेगा।

विशेष -ः
क) नामांकित व्यक्ति की लिखित सहमति लेकर ही प्रत्येक समिति नामांकन प्रस्तावित कर सकती है।
ख) उक्त व्यवस्था के अभाव में यदि कोई सदस्य चाहे तो अपना नाम सीधे भी भेज सकता है अथवा अन्य उपयोगी व्यक्ति का नाम प्रस्तावित कर सकता है।
ग) अखिल भारतीय ओमर-ऊमर वैश्य महासभा की कार्यसमिति के पास किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति के चयन का अधिकार सदैव सुरक्षित रहेगा।

18. केन्द्रीय कार्यसमिति का गठन :
क) महासभा के कार्य को सुचारू रूप से संचालित करने हेतु 1 कार्यसमिति का गठन किया जायेगा। जिसमें 21 पदाधिकारी तथा 60 सदस्य होगें, जिसमें कम से कम 30 महिला सदस्य होना अनिवार्य होगा। इस कार्यसमिति में 33 सदस्य धारा 11 (छ) तथा धारा 16 (ग) के प्रावधानों के अनुसार मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय समिति के अध्यक्ष अथवा क्षेत्रीय समिति द्वारा नामित प्रतिनिधि धारा 18 की उपधारा ‘ख’ के अनुसार चयनित होंगे। पिछले सत्र के निवर्तमान अध्यक्ष, महामंत्री तथा कोषाध्यक्ष इस केन्द्रीय समितियों के अनिवार्य सदस्य होंगे।
ख) क्षेत्रीय समितियों के 33 सदस्यों का चयन केन्द्रीय कार्यसमिति में निम्नवत् होगा -
1) 11 सदस्य अधिकतम संख्या वाली प्रथम 11 क्षेत्रीय समितियों के अध्यक्ष/नामित प्रतिनिधि होंगे।
2) 11 सदस्यों का चयन 100 से अधिक संख्या वाली समितियों से उनके अध्यक्ष/नामित प्रतिनिधियों द्वारा स्वयं किया जायेगा।
3) 11 सदस्यों का चयन 100 सदस्यों से कम संख्या वाली क्षेत्रीय समितियों के उनके अध्यक्ष/नामित/प्रतिनिधियों द्वारा स्वयं किया जायेगा।
4) यदि क्षेत्रीय समितियों से पूरे 33 पद नहीं भरे जा पाते हैं तो उस दशा में अध्यक्ष शेष निर्वाचित कार्यसमिति के बहुमतए द्वारा अन्य शेष सदस्यों का चयन कर लेगा।

19. पदाधिकारी -
1 अध्यक्ष, 7 उपाध्यक्ष, 1 महामंत्री, 2 मंत्री, 1 संगठन मंत्री, 1 प्रचार मंत्री 1 प्रकाशन मंत्री, 1 सम्मेलन व्यवस्था मंत्री (जो प्रत्येक स्वागत समिति का पदेन सदस्य होगा) 1 कोषाध्यक्ष, 1 निरीक्षक, 4 आंचलिक मंत्री।

निर्वाचन -
क) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्रियों को छोड़कर शेष पदाधिकारियों एवं 10 सदस्यों का निर्वाचन खुले अधिवेशन में होगा।
ख) उपाध्यक्षों का मनोनयन अध्यक्ष द्वारा एवं संयुक्त मंत्रियों का महामंत्री द्वारा होगा तथा शेष सदस्यों का चयन निर्वाचित पदाधिकारियों, सदस्यों तथा चयनित पदेन सदस्यों द्वारा किया जायेगा।
घोषणा -
इस प्रकार गठित सम्पूर्ण कार्यसमिति की विधिवत घोषणा अध्यक्ष महोदय द्वारा अधिवेशन में कर दी जायेगी।

20. कार्यकाल : सम्पूर्ण कार्यसमिति का कार्यकाल धारा 22 के अनुसार एक सत्र का होगा।

21. महासभा वर्ष : अप्रैल से प्रारम्भ होकर मार्च तक रहेगा।

22. अधिवेशनः- महासभा का अधिवेशन त्रैवार्षिक होगा और एक अधिवेशन से दूसरे अधिवेशन के बीच की अवधि 1 सत्र मानी जायेगी तथा प्रत्येक अधिवेशन में निर्वाचन होगा।

23. बैठकें :-
कार्यसमिति की बैठक वर्ष में कम से कम दो बार अवश्य होगी।

विशेष :- (क) अध्यक्ष की अनुपस्थिति में वयोवृद्ध उपाध्यक्ष की अध्यक्षासन ग्रहण करेगा।
(ख) प्रत्येक मनोनयन में सभी क्षेत्रों का उचित प्रतिनिधित्व रखने का ध्यान आवश्यक होगा।

24. कार्य :-
(क) कार्यसमिति की महासभा की उच्चतम कार्यपालिका होगी और महासभा द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों, नीतियों एवं पारित प्रस्तावों का क्रियान्वयन करेगी।
ख) महासभा के उद्देश्यों का अधिकारिक प्रचार एवं प्रसार करना तथा उद्देश्य पूर्ति हेतु आवश्यक व्यवस्था करेगी।
ग) संगठन की दृष्टि से आवश्यकतानुसार अनुशासन की कार्यवाही करेगी।
घ) समस्त वादों का निर्णय करेगी तथा तत्सम्बन्धी प्रभावी कदम उठायेगी।
ड़) महासभा का प्रबन्ध करेगी।
च) उद्देश्यों एवं व्यवस्था की पूर्ति हेतु आवश्यक उपसमितियो का गठन करेंगी।
छ) सभी क्षेत्रीय कार्यसमितियों का अधीक्षण, निर्देशन एवं नियमन करेगी।
ज) महासभा की सम्पूर्ण निधि का नियंत्रण एवं विभिन्न समितियों, उपसमितियों के लिये उपयुक्त विनियोग के नियम बनाना तथा उसके अंकेक्षण का प्रबन्ध करेगी।
झ) महासभा द्वारा गठित श्री ओमर-ऊमर वैश्य आर्थिक सहायताए समिति के लिए 9 सदस्यों का मनोनयन करेगी।

30. अधिवेशन शुल्क :-
महासभा अधिवेशन में प्रतिनिधि व्यवस्था के लिये प्रत्येक व्यक्ति से कम से कम रू0 1/- प्रतिनिधि शुल्क के रूप में लिया जायेगा। जिसे लेने तथा व्यय करने का अधिकार केवल मात्र सम्बन्धित स्वागत समिति को ही होगा।

31. स्थाई कोष :-
महासभा का एक स्थायी कोष होगा। जिसके अन्तर्गत आजीवन एवं संरक्षण सदस्यता के रूप में प्राप्त धन एवं प्रत्येक अधिवेशन के बाद स्वागत समिति के पास बचा धन तथा महासभा स्थाई कोष हेतु प्राप्त धन किसी राष्ट्रीयकृत की अनुमति से किया जायेगा।

32. गणपूर्ति :-
कार्यसमिति की संख्या का 1/3 या पूर्ण विभाजित न होने पर भजनफल में 1 जोड़ कर जो संख्या बने वह गणपूरक संख्या होगी। जिसके अभाव में बैठक स्थगित कर दी जायेगी। स्थगित बैठक की गणसंख्या 11 होगी।

33. संशोधन :-
संविधान में समय एवं परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक संशोधन हो सकते हैं किन्तु यह संशोधन खुले अधिवेशन में कम से कम 2/3 उपस्थित सदस्यों द्वारा स्वीकृत होना अनिवार्य है।

34. विशेष :-
यदि किसी स्थानीय समिति, क्षेत्रीय समिति, नगर समिति एवं केन्द्रीय समिति के सदस्य अथवा पदाधिकारी किसी भी प्रकार से महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव एवं संविधान के प्रतिकूल आचरण करे तो उसकी लिखित आपत्ति उक्त समिति के साधारण सदस्यों या पदाधिकारियों द्वारा, जिनकी संख्या 10 हो, अपने से ऊपर प्रवर समिति को कर सकती है। (वहां निर्णय न होने पर अ0भ0 अध्यक्ष से) की जा सकती है। वे इसकी जांच कर सुधार का अवसर देंगे। फिर भी न मानने पर कार्यसमिति द्वारा प्रस्ताव पारित कर उसे महासभा की सम्बद्धता/साधारण सदस्यता से वंचित किया जा सकता है)

35. रिक्त पद की पूर्ति :-
समिति के किसी भी प्रदाधिकारी का स्थान यदि त्याग-पत्र, मृत्यु या किसी अन्य कारण से रिक्त होता है तो कार्यसमिति को अधिकार होगा ि कवह उक्त पद की पूर्ति अवशिष्ट सत्र के लिये कर ले।)

36. सदस्यता :-
अ) महासभा सदस्य बनाने का कार्य क्षेत्रीय एवं केन्द्रीय कार्यसमिति द्वारा किया जायेगा।
ब) सदस्य बनाने हेतु सदस्यता प्रपत्र का प्रयोग किया एजायेगा, जिसे केन्द्र द्वारा प्राप्त किया जा सकेगा।
स) अन्य किसी भी प्रकार के धन प्राप्ति हेतु जो रसीद बहियाँ प्रयुक्त की जायेंगी, वह केवल केन्द्र द्वारा ही वितरित होगी। किसी भी अन्य समिति को छापने का अधिकार न होगा।

37. निकाय की बैठके :-
अ) क्षेत्रीय समिति (कम से कम) वर्ष में 3 बार।
ब) के0 कार्यसमिति (कम से कम) वर्ष में 2 बार।

38. बैठक की सूचना :-
क) क्षेत्रीय समितियाँ कम से कम बैठक के 7 दिन पूर्व।
ब) केन्द्रीय कार्यसमितियों कम से कम बैठक के 15 दिन पूर्व। किन्तु आवश्यक स्थिति में केवल 48 घण्टे की सूचना पर भी किसी समिति की बैठक आहूत की जा सकेगी।

पदाधिकारी के अधिकार एवं कर्तव्य
39. अध्यक्ष :-
अ) महासभा की प्रत्येक बैठक की अध्यक्षता करेंगे। सभा के कार्य संचालन का उत्तरदायित्व अध्यक्ष पर होगा।
ब) अध्यक्ष का अधिकार होगा कि वे किसी ऐसे तत्कालिक प्रस्ताव को जिसे वे सामाजिक हित में अनुपयुक्त समझते हों प्रस्तुत करने की अनुमति न दें।
स) अध्यक्ष को कार्यसमिति द्वारा परित बजट के अतिरिक्त रू0100/- तक व्यय की स्वीकृति आवश्यकतानुसार देने का अधिकार होगा।
द) कार्यसमिति की बैठकों में, महासभा की अन्य बैठक में यदि किसी प्रस्ताव पर पक्ष या विपक्ष पर बराबर मत हो तो अध्यक्ष का मत निर्णायक होगा।

40. उपाध्यक्ष :-
अ) अध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्ष के समस्त अधिकार एवं कर्तव्य होंगे।

41. महामंत्री :-
अ) महामंत्री को समस्त कागजात का लेखा-जोखा रखना, पत्र-व्यवहार करना एवं समस्त विवरण रखना तथा महासभा के समस्त कार्यक्रम तैयार करना, सभा की बैठकों की व्यवस्था करना एवं कार्यवाही संचालन करना।
ब) क्षेत्रीय समितिं से सम्पर्क रखना, उनको कार्यक्रम देना एवं उनका वृत्त रखना।
स) दानादि प्राप्त करना तथा कोष की व्यवस्था में सहयोग देना एवं सभा के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु रु0 1000/- तक एक बार में व्यय करने का विशेष अधिकार होगा।
द) प्रत्येक प्रकार की वैधानिक कार्यवाही महामंत्री के द्वारा होगी।
42. मंत्री :-
अ) महामंत्री की अनुपस्थिति में मंत्री के भी वही अधिकार एवं कर्तव्य होंगे जो महामंत्री के हैं।
ब) महामंत्री को महासभा के कार्यो को व्यवस्थित एवं सुचारू रूप से संचालित करने में सहयोग प्रदान करेगा।

43. संगठन मंत्री :-
अ) महासभा संगठन के विकास एवं उनकी समुन्नति के उद्देश्यों से विभिन्न क्षेत्रों में सभा का प्रचार एवं प्रसार करना।
ब) सभा के संगठन को व्यापक एवं उपयोगी बनाने के लिए स्थान-स्थान का दौरा करना एवं इकाइयों को स्थापित करना एवं सभाओं का आयोजन करना।

44. प्रचार मंत्री :-
महासभा क उद्देश्यों को प्रचारित एवं प्रसारित करने हेतु समय-समय पर आवश्यक प्रपत्रों का प्रकाशन करना एवं तत्सम्बन्धी दौरा करना। स्थानीय समितियों, क्षेत्रीय समितियों एवं केन्द्रीय समिति के बीच तारतम्य स्थापित करना एवं तद्उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कार्यक्रमों की व्यवस्था करना।

45. प्रकाशनमंत्री :-
महासभा के मुख पत्र हितैषी दूत के नियमित प्रकाशन की व्यवस्था करना, तत्सम्बन्धी उपसमितियों का गठन करना तथा प्रकाशन का सम्पूर्ण हिसाब-किताब प्रतिवर्ष आडिट कराकर कोषाध्यक्ष के पास प्रेषित करना।

46. कोषाध्यक्ष :-
अ) महसभा के समस्त आय-व्यय हिसाब रखना।
ब) स्थाई कोष एवं अन्य प्राप्त धन को किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में रखना।
स) महासभा के लिए आय-व्यय का वार्षिक बजट बनाना।
द) महासभा एवं ’हितैषी दूत’ स्थाई कोष को बढ़ाने में सतत् सहयोग प्रदान करना।
य) कोषाध्यक्ष को बैंक में महासभा के नाम से नियमानुसार धन जमा करने का अधिकार होगा किन्तु रूपया निकालने के लिए चेक पर अध्यक्ष, मंत्री एवं कोषाध्यक्ष में से किन्हीं दो के संयुक्त हस्ताक्षर होना अनिवार्य होगा। इसी प्रकार व्यय बाउचरों पर उपरोक्त में से किन्हीं दो के हस्ताक्षर होना अनिवार्य होगा।
र) निरीक्षक द्वारा समस्त आय-व्यय निरीक्षित कराकर कार्य समिति के सम्मुख प्रस्तुत करना।

47. निरीक्षक :-
महासभा के समस्त आर्थिक प्रपत्रों एवं आय-व्यय के हिसाब-किताब की जाँच कर अपना प्रतिवेदन कार्यसमिति को प्रदान करना।
48. सम्मेलन व्यवस्था मंत्री :-
प्रतिवर्ष महासभा अधिवेशन एवं अन्य उपयोगी कार्यक्रमों की (संगठन मंत्री तथा कार्य स0 के परामर्श से) समय-समय पर व्यवस्था करना।

49. आंचलिक मंत्री :-
अपने अंचल में महासभा की क्षेत्रीय, स्थानीय समितियों का गठन करना। महासभा के कार्यो को सुचारू रूप से चलाने में उन्हें सहयेग करनाअ और उसकी सूचना केन्द्रीय कार्यालय को प्रेषित करना।

50. विशेष :-
अ) विधि सम्बन्धी आपत्ति एवं संविधान के प्रतिकूल आचरण करने पर संबंन्धित व्यक्ति संस्था अथवा पदाधिकारी को सचेत कर उसे समाज विरोधी कार्यो से विरत एवं न मानने पर अनुशासन की कार्यवाही करने या स्पष्टीकरण पर विचार कर सदस्यता से वंचित करने का अधिकार केवल केन्द्रीय कार्यसमिति को होगा।
ब) अपने निकाय की लगातार तीन बैठकों में समुचित कारण के अभाव में अनुपस्थित रहने पर संबंधित समिति से उक्त सदस्य को पृथक किया जा सकता है।

50. सदस्यों के कर्तव्यएवं अधिकार :-
अ) कार्यसमिति के सदस्यों का यह कर्तव्य होगा कि महासभा द्यारा स्वीकृत प्रस्तावों को व्यापक रूप से कार्यान्वित करने का भरसक प्रयास करना। महासभा के प्रचार कार्ये में यथा शक्ति सहयोग प्रदान करना तथा अपने क्षेत्र की स्वजातीय समस्याओं को कार्यकारिणी तक पहुंचाने और उसका समाधान खोजने एवं समस्या के निराकरण हेतु कार्यसमिति को आवश्यक सहयोग प्रदान करना। अधिवेशन में पारित प्रस्तावों को सदस्यों द्वारा व्यवह्त करने के लिए प्रेरित करना तथा कार्यसमिति को निष्क्रिय होते देख सदस्यों में जागृति उत्पन्न करना।
ब) कार्यकारिणी सदस्यों के किसी प्रस्ताव पर महामंत्री कार्यसमिति की बैठक यदि नहीं आयोजित करते तो कम से कम 11 सदस्यों के हस्ताक्षर युक्त अनुमोदन पर महामंत्री को आवश्यक बैठक बुलाना अनिवार्य होगा। यदि फिर भी महामंत्री बैठक न बुलावें तो उन्हीं हस्ताक्षरकर्ता सदस्यों को अधिकार होगा कि वे अध्यक्ष की अनुमति से स्वयं बैठक आमंत्रित कर लें। यह बैठक संवैधानिक होगी और उसमें उपस्थित सदस्यों के बहुमत से उक्त प्रस्ताव या किसी पदाधिकारी के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पारित करने का अधिकार कार्यसमिति को होगा।
स) अपने निकाय की लगातार तीन बैठकों में समुचित कारण के अभाव में अनुपस्थित रहने पर सम्बन्धि समिति के उक्त सदस्यों को पृथक किया जा सकता है।

52. विभिन्न :-
अ) धारा 52 (अ) विलुप्त कर दी गई है।
ब) कार्यसमिति के किसी भी पदाधिकारी एवं सदस्य को महासभा के निमित्त किसी भी प्रकार का ऋण लेने का अधिकार नहीं होगा।
स) कार्यसमिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों को वर्ष में कम से कम एक सप्ताह का समय महासभा कार्यक्रम को कार्यान्वित करने हेतु स्वेच्छा एवं सुविधानुसार देना आवश्यक है। जिसकी व्यवस्था संगठन मंत्री के अन्तर्गत होगी।
द) महासभा से सम्बन्धित प्रत्येक इकाई को अपनी बैठकों की सूचना तथा वृत्त अपने से उच्च इकाइयों को एवं वार्षिक प्रतिवेदन केन्द्रीय कार्यालय को प्रेषित करना अनिवार्य होगा तथा प्रत्येक समिति अपने से सम्बन्धित निम्न इकाइयों के आचरण पर अधिनिर्देश दे सकेगी।
ध) युवजन संघ तथा मलि परिषद् का गठन तथा संचालन केन्द्रीय कार्यसमिति द्वारा स्वीकृत नियमों एवं निर्देशों से होगा।

53. आर्थिक विनियोजन :-
महासभा की समस्त क्षेत्रीय समितियाँ अपने-अपने क्षेत्र में महासभा के अधिकाधिक सदस्य बनाने का प्रयास करेगी और इस प्रकार जो धन प्राप्त होगा उसका विभाजन निम्न होगा।
अ) महासभा की साधारण सदस्यता द्वारा प्राप्त पूरा धन केन्द्रीय कार्यालय को भेजना अनिवार्य होगा। क्षेत्रीय समिति द्वारा समस्त स्टेशनरी या केन्द्रीय कार्यालय द्वारा धन के अर्धांश के बराबर कार्य संचालन हेतु स्टेशनरी या पोस्टेज हेतु अथवा आधी धनराशि अनुदान रूप से आपको भेजेगा।
ब) विशेष कार्यक्रमों हेतु जो धन अथवा अनुदान समितियाँ प्राप्त करेगी उसे स्वतंत्र रूप से अपनी कार्यसमिति के निश्चयानुसार व्यय कर सकेगी। किन्तु सभी प्रकार के व्यय एवं हिसाब-किताब का निरीक्षण, विवरण महासभा केन्द्रीय कार्यालय को भेजना अनिवार्य होगा।
स) किन्तु महासभा की आजीवन सदस्यता एवं संरक्षक सदस्यता द्वारा प्राप्त धन सम्पूर्ण रूप से महासभा केन्द्रीय कार्यालय को ही प्रेषित करना अनिवार्य होगा जो आवश्यक रूप से राष्ट्रीयकृत बैंक में महासभा स्थाई कोष के रूप में जमा किया जायेगा।

स्वजातीय झण्डा गान

(रचयिता - श्री भोला नाथ गुप्त, कछवा बाजार - मीरजापुर)

ओमर वैश्य समाज सहारा, फहरै झण्डा विमल हमारा।
प्रेम प्रतीक प्रथकता न्यारा, गौरव गरिमा मान हमारा।
क्रान्ति शान्ति नवयुग संचारा, युवक यूथ का जीवन सारा।
फहरे झण्डा विमल हमारा।

रंग केसरिया त्याग दिखाता, स्वास्तिक सेवा भाव सुझाता।
वाक्य वैश्य कतब्य बताता, खादी देश भक्त निर्धारा।
फहरे झण्डा विमल हमारा।

निर्भय इसके नीचे आओ, भ्रातृ भाव संगठन बढ़ाओ।
कुमति, कुरीति, कुरोग नसाओ, करो दासपन मन से न्यारा।
फहरे झण्डा विमल हमारा।

इसकी रक्षा में मिट जाना, मिट जाना सर नही झुकाना।
हित इसके सर्वस्य गंवाना, यह उन्नत तो उन्नित सारा।
फहरे झण्डा विमल हमारा।

वैश्य भाइयों आओ - आओ, निज माता की लाज बचाओ।
एक कण्ठ सब मिल कर गाओं, जय स्वजाति जय स्वदेश प्यारा।
फहरे झण्डा विमल हमारा।